1953 में 5 रुपए लेकर अम्बाला आईं थी दादी जानकी, बीडी अस्पताल के एक कमरे में शुरू किया था ब्रह्मकुमारी केंद्र


ब्रह्माकुमारी संस्थान की मुख्य प्रशासक राजयोगिनी दादी जानकी का 104 वर्ष की उम्र में माउंट आबू में देहावसान हो गया। 1954-55 में दादी जानकी ने ही अम्बाला में एक छोटे कमरे से ब्रह्मकुमारी केंद्र शुरू किया था। वर्तमान में अम्बाला सब जोन में 15 से ज्यादा शाखाएं हैं। जुलाई 2011 में दादी आखिरी बार अम्बाला में आईं थी। महिलाओं द्वारा संचालित दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक संगठन ब्रह्माकुमारी संस्थान की मुख्य प्रशासक एवं स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एम्बेसडर राजयोगिनी दादी जानकी ने का जन्म 1 जनवरी, 1916 को हैदराबाद सिंध (पाकिस्तान) में हुआ था। 21 वर्ष की उम्र में ब्रह्माकुमारी संस्थान के आध्यात्मिक पथ को अपना लिया था। वह मात्र चौथी तक पढ़ीं थी लेकिन आध्यात्मिक आभा से भरपूर भारतीय दर्शन, राजयोग और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए 1970 में पश्चिमी देशों का रुख किया। दादी जानकी ने माउंट आबू के ग्लोबल अस्पताल में शुक्रवार को प्रातः 2 बजे अंतिम सांस ली। पिछले दो महीने से श्वांस तथा पेट की तकलीफ थी। जीवन में उनके संपर्क में रहे लोगों की जुबानी दादी के 4 साल के अम्बाला प्रवास और ब्रह्मकुमारी केंद्र की कहानी...

दुकान जलने के अगले दिन ही कक्षा में पहुंचा, दादी ने ओम शांति का मेडल दिया: त्रिलोकीनाथ सूद

मैं अम्बाला केंद्र के शुरूआती दिनों से ही जुड़ा हुआ हूं। बात सन् 1963 की है। सदर बाजार में गोंडल ऑप्टिकल में तब आग लग गई थी और हमारा पूरा सामान जल गया था। आग लगने के बाद मैं घर आया और अगले दिन सुबह ब्रह्माकुमारी केंद्र में जाकर शिक्षा ली। इसके कुछ दिनों बाद जानकी दादी प्रचार कार्यक्रम के तहत अम्बाला आईं। उन्हें लोगों ने बताया कि मेरी दुकान जल गई थी। मगर, मैंने आगे बढ़कर दादी मां को बताया कि बेशक मेरी दुकान जली थी, मगर मैंने अगले दिन सुबह अपनी कक्षा मिस नहीं की। मेरी इस बात से जानकी दादी इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने कहा कि ‘मैं आज यहां से कुछ सीख कर जा रही हूं”। दादी जानकी ने मुझे ओम शांति मेडल देकर सम्मानित किया था।
जैसा 95 वर्षीय त्रिलोकीनाथ सूद ने बताया

दादी एक अच्छी मां
भी थी : राकेश भाई


राजयोगिनी दादी डॉ. जानकी प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुख्य प्रशासक के साथ-साथ एक बहुत अच्छी मां भी थी, जिन्हें सबका ख्याल रहता था। अपनेपन की अनुभूति दिलाती दादी किसी को भी तुरंत अपना बना लेती थीं। चाहे देश के राष्ट्रपति हों या प्रधानमंत्री, सबको भाई कहकर ही संबोधित करतीं। उनके अंदर इस उम्र में भी एक बचपना था। जो उन्हें सदैव ऊर्जावान रखता और देश ही नहीं विदेशों में भी सेवा कराता।
राकेश भाई, प्रवक्ता, अम्बाला ब्रह्मकुमारी।


मैंने उनसे मन शांत करना सीखा: पुरेवाल

मेरी मुलाकात जानकी दादी जी से माउंट आबू में 1983 में पहली बार हुई। उनका व्यक्तित्व बेहद साधा था, उन्हें देखकर ही मन को शांति मिलती थी। वह बहुत शांत रहते थे और मैंने भी वहीं से मन को शांत करना सीखा। हमारे आसपास कई गतिविधियां चलती है, लेकिन इनपर कैसे नियंत्रण किया जा सकता है यह मैंने उन्हीं से सीखा।
हरजीत सिंह पुरेवाल, कलाकार।

मेरा पूरा जीवन बदल दिया : राकेश मेहता

वर्ष 2007 में मेरी पहली बार माउंट आबू दादी जानकी जी से मुलाकात हुई और इस मुलाकात के बाद मेरा पूरा बदल गया। अध्यात्म में किस तरीके से आगे बढ़ा जा सकता है, मन की शक्ति का कैसे प्रयोग हो सकता है, शांत मुद्रा में कैसे रहा जा सकता है यह सब मैने उन्हीं से सीखा। अपनी शुभ भावनाएं कहीं पर पहुंचाना यह तक मैंने सीखा, आज कोरोना वायरस के कारण बेशक हम संस्कार में नहीं पहुंचे, मगर अपनी श्रद्धांजलि हम वहां भेज रहे हैं।
राकेश मेहत्ता, एयरफोर्स से रिटायर्ड


माउंट आबू से ब्रह्मा बाबा का हुक्म हुआ तो अलग-अलग क्षेत्रों में शिष्य केंद्रों की स्थापना करने निकल गए थे। दादी जानकी जी को सन् 1953 में 5 रुपए से भी कम राशि के साथ उस समय भेजा गया था। मकसद था कि जगह-जगह सेंटर बनाकर ब्रह्मा बाबा का संदेश दिया जाए। अम्बाला में दादी जानकी सबसे पहले एसडी मंदिर में पहुंचीं। यहां किसी को जानती नहीं थीं। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी रहीं, दो दिन तक यहीं मंदिर में रुकीं। किसी की मदद से उन्हें पुल चमेली के पीछे छोटा सा कमरा मिला, जहां पर उन्होंने शिक्षाएं देनी आरंभ की। कुछ समय यहां व्यतीत करने के साथ लोग उनके साथ जुड़ना आरंभ हुए और फिर कबाड़ी बाजार में सुभाष बंसल के निवास पर वह रहकर गतिविधियों का संचालन करती रहीं। फिर कबाड़ी बाजार में फकीरचंद अग्निहोत्री के निवास पर करीब एक साल रहीं और वहीं से केंद्र की गतिविधियां चलती थी। इसके बाद वर्ष 1954-55 में बीडी अस्पताल में एक कमरा ब्रह्माकुमारी केंद्र के लिए मिला और यहीं पर आश्रम बना। धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे और यह स्थान कम पड़ने लगा। 1983-84 में दयालबाग में ब्रह्माकुमारी के अम्बाला सब जोन की स्थापना की गई थी। पंजाब जोन के अधीन आने वाले अम्बाला सब जोन के अधीन 15 सेंटर हैं। जिनमें साहा, मुलाना, बराड़ा, सढ़ौरा, रायपुररानी, डिफेंस कॉलोनी, सिटी, शहजादपुर, नारायणगढ़, बिलासपुर पड़ते हैं। इनके आगे छोटे सेंटर है। अम्बाला सब जोन इंचार्ज कृष्णा बहन जी के दादी जानकी जी बहुत करीबीं रही। मैं 3 वर्ष की थी जब 1961 से अपने पेरेंट्स के साथ मैंने आश्रम आना शुरू कर दिया था। उनमें एक चुंबकीय आकर्षण था और वह हमेशा उन्हें विकट समय में ओम शांति की शिक्षा देती थी। जैसा अंजलि वधावन ने बताया।


साल 2011 में अम्बाला में एक कार्यक्रम के दौरान मौजूद दादी जानकी।



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