माता चंद्रघंटा की कहानी और पूजा का क्या है महत्व


माता चंद्रघंटा की आरती

नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान।

मस्तक पर है अर्ध चन्द्र, मंद मंद मुस्कान॥

दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खडग संग बांद।

घंटे के शब्द से हरती दुष्ट के प्राण॥

सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके सवर्ण शरीर।

करती विपदा शांति हरे भक्त की पीर॥

मधुर वाणी को बोल कर सब को देती ग्यान।

जितने देवी देवता सभी करें सम्मान॥

अपने शांत स्वभाव से सबका करती ध्यान।

भव सागर में फंसा हूं मैं, करो मेरा कल्याण॥

नवरात्रों की मां, कृपा कर दो मां।

जय मां चंद्रघंटा, जय मां चंद्रघंटा॥

पूजा का विधान...

भक्ता मां की पूजा में विशेष रूप से लाल रंग के फूल चढ़ाएं। साथ में फल में लाल सेब चढ़ाएं। भोग चढ़ाने के दौरान और मंत्र पढ़ते वक्त मंदिर की घंटी जरूर बजाएं, क्याेंकि मां चंद्रघंटा की पूजा में घंटे का बहुत महत्व है।

घंटे की ध्वनि से मां बरसाती है कृपा


मान्यता है कि घंटे की ध्वनि से मां चंद्रघंटा अपने भक्तों पर हमेशा अपनी कृपा बरसाती हैं। मां को दूध व उससे बनी चीजों का भोग लगाएं। उपासना के बाद भी दान का भी महत्व है। मखाने की खीर का भोग लगाना बहुत अच्छा माना जाता है, क्याेंकि ऐसा करने से मां खुश होती है अाैर दुखों का नाश करती हैं।


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मां दुर्गा जी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। माथे पर बना आधा चांद इनकी पहचान है। इस अर्ध चांद की वजह के इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां काे राक्षसों का वध करने के लिए जाना जाता है।

मान्यता है कि वह अपने भक्तों के दुखों को दूर करती हैं। इसीलिए उनके हाथों में तलवार, त्रिशूल, गदा और धनुष होता है। इनकी उत्पत्ति ही धर्म की रक्षा और संसार से अंधकार मिटाने के लिए हुई। मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की उपासना साधक को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले उपासक को संसार में यश, कीर्ति और सम्मान मिलता है। मां का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण है। मां स्वरूप इनके सवारी शेर सोने की तरह चमकीला है। दसों हाथों में कमल और कमंडल के अलावा अस्त-शस्त्र हैं। अपने वाहन सिंह पर सवार मां का यह स्वरूप युद्ध व दुष्टों का नाश करने के लिए तत्पर रहता है। चंद्रघंटा को स्वर की देवी भी कहते हैं।



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