कोरोना वायरस से बचाव के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्वास्थ्य अधिकारी पूरे माह मीटिंगों में बेहतर प्लानिंग बनाते रहे, लेकिन धरातल पर इस प्लान को लागू करना उनके लिए आसान नहीं दिख रहा है। नव निर्माण के लिए जिला अस्तपताल के भवन का काफी हिस्सा तोड़ा जा चुका है। इससे यहां पर मरीजों के लिए तो जगह की भारी कमी है ही। डॉक्टरों के बैठने के लिए भी उचित व्यवस्था नहीं है। न समय रहते अस्थाई अस्पताल बन पाया और न ही स्टाफ व संसाधन पूरे हो पाए। अब कोरोना के तीन पॉजिटिव केस सामने आने पर अधिकारियों के हाथ पांव फूल रहे हैं क्योंकि हकीकत यह है कि गांव के सब सेंटर से लेकर शहर व कस्बे तक की सीएचसी, पीएचसी व अस्पतालों में स्टाफ व जरूरी संसाधनों की भारी कमी है। जिले के विभिन्न अस्पतालों व सेंटरों पर मेडिकल ऑफिसर की 141 पोस्ट हैं, इनमें से करीब 80 वेकेंट हैं।
वहीं 542 एनएचएम कर्मी है। यमुनानगर सिविल अस्पताल की बात करें तो 55 में 20 ही मेडिकल ऑफिसर हैं। यहां फिजिशियन व आर्थो सर्जन सिर्फ एक है। न्यूरो सर्जन है ही नहीं। सीएचसी, पीएचसी से लेकर अस्पतालों में एसएमओ, एमओ से लेकर नर्सिंग स्टाफ भी आधा ही है।
कोरोना में फिजिशियन व न्यूरो सर्जन का अहम रोल
चिकित्सकों की मानें तो फिजिशियन किसी भी अस्पताल की रीढ़ होता है। बुखार से लेकर गंभीर बीमारियों तक के पेशेंट को फिजिशियन ही ट्रीट करता है। कोरोना के इलाज में भी फिजिशियन का होना जरूरी है, जो जिले में सिर्फ एक ही है। इसी तरह रिसर्च में सामने आया कि कोरोना के केसों में दिमाग में सूजन की भी शिकायत आ रही है। ऐसे केसों में न्यूरो सर्जन या न्यूरो फिजिशियन की सलाह बहुत जरूरी है, जो यहां है ही नहीं।
- ईएसआई अस्पताल को कोविड-19 अस्पताल बनाया गया है। यहां निजी अस्पतालों लेकर चार वेंटिलेटर लगाए हैं। साथ ही 15 बेड पर सेंट्रल ऑक्सीजन सिस्टम लगाया है। प्रयास है कि किसी मरीज को परेशानी न हो। आपदा को देखते हुए कोरोना पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है।डॉ. विजय दहिया, सिविल सर्जन, यमुनानगर।
दूसरे मरीजों पर इफेक्ट
कोरोना वायरस अलर्ट के बाद से स्वास्थ्य अधिकारियों का कोरोना पर ही फोकस है। जबकि रोज होने वाली सामान्य ओपीडी 1200 से नाममात्र हो गई है। वहीं अस्पताल पहुंच रहे लोगों के लिए अलग से बनी जुखाम-खांसी की ओपीडी भी बंद कर दी गई है। उधर, ट्रामा सेंटर में भर्ती गंभीर मरीजों के इलाज पर असर पड़ा है। महिला व पुरुष वार्ड के बाहर नोटिस चस्पा दिया कि एकमात्र आर्थो सर्जन होने से ऑपरेशन में 3 से 4 सप्ताह का समय लग सकता है। उधर स्वास्थ्य अधिकारी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की हिदायत दे रहे हैं, लेकिन ट्रॉमा सेंटर के पुरुष वार्ड में सोशल डिस्टेंस नहीं है। पुरुष वार्ड में एक बेड पर दो-दो मरीज व तीमारदार नजर आ रहे हैं।
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