माता ब्रह्मचारिणी की कहानी और पूजा का क्या है महत्व


पूजा का विधान...

नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।

भक्तों को साहस प्रदान करती है मां

मां की कथा का सार है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा जीवन के कठिन क्षणों में भक्तों को साहस प्रदान करती है।

ब्रह्माचारिणी देवी की आरती

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने। जो ​तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी।

यह कटिंग घर में रखकर पूजा करें

मां दुखभंजनी देवी मंदिर, जैन कॉलेज रोड

नवरात्र : मंदिर बंद हैं, घर में रहते हुए माता के स्वरूपों के दर्शन कीजिए भास्कर में

पूर्वजन्म में इस माता ने हिमालय के घर बेटी के रूप में जन्म लिया था और नारद के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या की। कठोर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी यानी ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहीं। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के कड़े कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम कमजोर हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व बताया। कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह आप से ही मुमकिन थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे।



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Ambala News - haryana news what is the significance of the story and worship of mother brahmacharini


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